कुरुक्षेत्र पैनोरमा विज्ञान केंद्र
(राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद की एक इकाई)
कुरुक्षेत्र पैनोरमा विज्ञान केंद्र
राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद की एक इकाई

गैलरी >> भारतीय वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय विरासत दीर्घा

इतिहास के प्रारम्भ से ही विश्व की विभिन्न संस्कृतियों ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विविध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जो अनेक बार संस्कृतियों के सांस्कृतिक प्रभावों-तत्वों के माध्यम से विकसित हुए। दुर्भाग्यवश, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का इतिहास प्रायः पाश्चात्य दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे भारत सहित अन्य सभ्यताओं के योगदानों की संभावनाएं होती रही है।
इस प्रदर्शनी के माध्यम से प्राचीन भारत की स्वतंत्र एवं विशिष्ट वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। इसमें दर्शाया गया है कि उस समय उपलब्ध सीमित तकनीकों के बावजूद धात्विक जस्ता (जिंक) प्राप्त करने के लिए जस्ता गलाने (जिंक स्मेल्टिंग) की प्रक्रिया किस प्रकार विकसित की गई, जो अत्यंत जटिल मानी जाती थी। दीर्घा में ‘दशमलव घात’ (दस की घात), ‘त्रैराशिक नियम’ (तीन का नियम), तथा लगभग 1500 वर्ष पूर्व विकसित वर्गमूल एवं घनमूल निकालने की लागू को यौगिकों प्रदर्शों के माध्यम से समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, नक्षत्रों की अवधारणा, सूर्य एवं चंद्रमा की गतियों को भी सजीव एवं सहभागितापूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ जयपुर स्थित जंतर-मंतर— जिसे महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन हेतु निर्मित विशाल पत्थर वेधशालाओं के समूह के रूप में जाना जाता है—को भी देख और समझ सकते हैं, तथा यह जान सकते हैं कि इनके माध्यम से गणनाएँ किस प्रकार की जाती थीं। इस प्रदर्शनी में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टांग हृदय जैसे पारंपरिक भारतीय चिकित्सा ग्रंथों का भी वर्णन किया गया है। साथ ही, भारत की समृद्ध कला एवं हस्तशिल्प परंपरा की झलक भी इस दीर्घा में प्रस्तुत की गई है।
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Walk-in-Test for Engagement of Trainee Craft (Electrical & Fitter) at Kurukshetra Panorama & Science Centre, Kurukshetra

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